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دوش ديدم که ملائک در ميخانه زدند ...
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خوشتر از فکر مي و جام چه خواهد بودن ...
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صلاح از من چه مي جويي که ياران را صلا گفتيم ...
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واعظان کين جلوه بر محراب و منبر مي کنند ...
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اگر آن ترک شيرازي بدست آرد دل ما را ...
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مرا مي بيني و هر دم زيادت مي کني دردم ...
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دوش با من گفت پنهان کارداري تيز هوش ...
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به تيغم گر کشد دستش نگيرم ...
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سلامي چو بوي خوش آشنايي ...
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نفس باد صبا مشک فشان خواهد شد ...
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دست از طلب ندارم تا کام من برآيد ...
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خمي که ابروي شوخ تو در کمان انداخت ...
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خلوت گزيده را به تماشا چه حاجت است ...
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شاه شمشاد قدان خسرو شيرين دهنان ...
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سر ارادت ما و آستان حضرت دوست ...
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اي دل مباش يکدم خالي ز عشق و مستي ...
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خوش بود گر محک تجربه آيد به ميان ...
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بيا که رايت منصور پادشاه رسيد ...
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بعد از اين دست من و دامن آن سرو بلند ...
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دوش با من گفت پنهان کارداني تيزهوش ...
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اي خرّم از فروغ رخت لاله زار عمر ...
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دوش در حلقه ما صحبت گيسوي تو بود ...
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مژده دادند که بر ما گذري خواهي کرد ...
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مرحبا اي پيک مشتاقان بگو پيغام دوست ...
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بنفشه دوش به گل گفت و خوش نشاني داد ...
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بوي بهبود ز اوضاع جهان مي شنوم ...
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سحرم دولت بيدار به بالين آمد ...
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خوش بود گر محک تجربه آيد به ميان...
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سحر بلبل حکايت با صبا کرد ...
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کنون که در چمن آمد گل از عدم بوجود ...
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